मैं तो जगन्नाथ जी का आदमी हूँ | गोविंद दास का आधा चूड़ा-गुड़ कैसे बना प्रभु का भोग | हृदयस्पर्शी कथा
moti singh Rathore
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मैं तो जगन्नाथ जी का आदमी हूँ | गोविंद दास का आधा चूड़ा-गुड़ कैसे बना प्रभु का भोग | हृदयस्पर्शी कथा
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moti singh Rathore
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‼️हृदयस्पर्शी मार्मिक कथा‼️
पुरी में समुद्र से थोड़ी दूर एक छोटी-सी कुटिया थी। वहीं रहते थे गोविंद दास।
न कोई बड़ा आश्रम, न शिष्यों की भीड़ और न ही उनके पास कोई धन-दौलत। बस एक मिट्टी का चूल्हा, भगवान जगन्नाथ की छोटी-सी तस्वीर और एक पुराना पीतल का कटोरा।
गोविंद दास की एक आदत थी। मंदिर में दर्शन करने के बाद वे सीधे घर नहीं लौटते थे। पहले मंदिर के बाहर बैठे किसी भूखे को कुछ खिलाते, फिर स्वयं भोजन करते।
एक दिन मंदिर से लौटते समय उन्होंने देखा कि एक बूढ़ा आदमी सीढ़ियों के पास बैठा था। उसके सामने खाली पत्तल रखी थी। गोविंद दास ने अपनी पोटली खोली - उसमें बस दो मुट्ठी चूड़ा और थोड़ा गुड़ था। उन्होंने आधा उस बूढ़े को दे दिया। बूढ़े ने कहा, "बाबा, तुम भी तो भूखे होगे?" गोविंद दास मुस्कुराए - "मैं तो जगन्नाथ जी का आदमी हूँ। मेरा हिस्सा कहीं न कहीं से आ ही जाएगा।"
अगली सुबह मंदिर में एक अजीब बात हुई। भोग में एक कटोरी में रखा थोड़ा-सा चूड़ा और गुड़ अलग पड़ा था। वृद्ध सेवक ने कहा - "रहने दो। आज प्रभु के भोग में यह भी रहेगा।"
उधर गोविंद दास के पास खाने को कुछ नहीं था। तभी एक छोटा-सा बालक मिट्टी का पात्र लेकर आया - गरम भात, दाल और गुड़। "माँ ने भेजा है।" "तुम्हारी माँ कौन है?" बालक ने मंदिर की दिशा में हाथ कर दिया - "वहीं।" पात्र पर चंदन की हल्की-सी सुगंध थी।
कुछ दिनों बाद गोविंद दास बहुत बीमार पड़ गए। मंदिर जाना छोड़ दिया। एक रात तेज बारिश में दरवाजे पर दस्तक हुई - "बाबा, प्रसाद लाया हूँ।" वही वृद्ध सेवक पत्तल लेकर खड़ा था - "आज भोग लगाते समय मुझे बार-बार तुम्हारा चेहरा याद आ रहा था।"
गोविंद दास की आँखें भर आईं - "भक्त तो मैं था ही नहीं। आपने ही मुझे अपना समझ लिया था।"
तब समझ आया - "भक्त भगवान को भोजन नहीं खिलाता। भक्त तो बस अपने हिस्से की चीज प्रेम से सामने रखता है... भोजन भगवान स्वीकार करें या न करें, लेकिन प्रेम को वे कभी वापस नहीं करते।"
कहते हैं, भक्ति में भगवान को महँगे भोग से अधिक उस भावना की तलाश रहती है जिसमें भक्त यह भूल जाए कि वह भगवान को कुछ दे रहा है। उसे बस इतना लगे - "मेरे पास जो है, उसमें आपका भी हिस्सा है।"
और शायद इसी भाव से किया गया छोटा-सा अर्पण कभी-कभी बड़े से बड़े भोग से भी अधिक प्रिय हो जाता है।🙏
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