माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 04 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |
Swami Akhandanand Saraswati By Anand Prastuti
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माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 04 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |
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माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 04 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |
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परम पूज्य महाराजश्री द्वारा दिए गए इस प्रवचन (माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 04) के मुख्य बिन्दु निम्नलिखित हैं:
मुख्य बिंदु -
🔸1. जीव की नित्यता (01:14 - 01:53): परम पूज्य महाराजश्री स्पष्ट करते हैं कि आत्मा न तो उत्पन्न होती है और न ही नष्ट होती है। जन्म और मृत्यु केवल उपाधियों (शरीर, मन आदि) में होते हैं, आत्मा में नहीं ।
🔸2 . घटाकाश का दृष्टांत (01:58 - 03:11): परम पूज्य महाराजश्री ने आकाश और घड़े का उदाहरण देकर समझाया कि जैसे घड़े के बनने या फूटने से आकाश में कोई परिवर्तन नहीं आता, वैसे ही शरीर के जन्म-मरण से आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता ।
🔸3 . अस्ति, भवती और करोति (03:16 - 05:27): परम पूज्य महाराजश्री ने इन तीन क्रिया पदों के माध्यम से सृष्टि की प्रक्रिया को समझाया। शंकराचार्य के मत अनुसार ब्रह्म 'अस्ति' (जो मात्र है) रूप है, वह न तो 'भवति' (परिवर्तित होता है) और न ही 'करोति' (संसार का निर्माण करता है) ।
🔸 4 .सृष्टि का विज्ञान (26:33 - 29:02): सृष्टि दो प्रकार की बताई गई है—एक 'ईश्वर सृष्टि' (जो प्रकृति, सूर्य, तारे आदि है) और दूसरी 'जीव सृष्टि' (जो 'मैं' और 'मेरा' का अभिमान है)। दुख और बंधन का कारण जीव द्वारा निर्मित 'मैं-मेरा' का भाव ही है ।
🔸5 .राग-द्वेष और मन (33:03 - 35:07): राग और द्वेष का कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है, यह मन पर लगने वाला एक प्रकार का 'ग्रहण' है। साक्षी को अहंकार के साथ जुड़े हुए ये राग-द्वेष ही दिखाई पड़ते हैं ।
🔸6 . बंधन और मुक्ति (39:40 - 40:21): जब मनुष्य अपने आप को 'बद्ध' मानता है, तभी वह बंध जाता है। अधिष्ठान ज्ञान (आत्मा का ज्ञान) ही वास्तविक मुक्ति का मार्ग है ।
🔸7 . सांख्य मत का खंडन (55:04 - 56:57): अंत में, परम पूज्य महाराजश्री सांख्य दर्शन के इस मत का खंडन करते हैं कि अंतःकरण या सुख-दुख के आधार पर आत्माएं अनेक हैं। उन्होंने वाचस्पति मिश्र और 'भामती' ग्रंथ के प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि पुरुष और प्रकृति के भेद को न समझने के कारण ही यह भ्रांति होती है ।
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