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आओ निज मंदिर में आओ,

आत्मन भक्ति धारा

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आओ निज मंदिर में आओ,

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आत्मन भक्ति धारा
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आओ निज मंदिर में आओ, शाश्वत प्रभु का दर्शन पाओ। अनुभव अमृत पान कराओ, आया आया रे प्रसंग आनन्द का ।। हो,,आया आया रे प्रसंग आनन्द का ।। मैं हूँ दुखी अनादि का, ऐसी भ्रान्ति टाल, आत्मा तो सुखकन्द है, हो जा आज निहाल। दुर्विकल्प सब दूर भगाओ अब तो निज की महिमालाओ ।। सचमुच अद्भुत तृप्ति पाओ, देखो देखो रे वैभव चैतन्य का हो,,देखो देखो रे वैभव चैतन्य का। करें प्रकाशित लोक को पर प्रकाश भिन्न जान, किंचित् विकृति हो नहीं, त्यों ही ज्ञान पिछान। निर्मल ज्ञान दृष्टि में लाओ, ज्ञान मात्र दृष्टि प्रभु को ध्याओ ।। तीन लोक की प्रभुता पाओ, जानो-जानो रे माहात्म्य चैतन्य का । हो,,जानो-जानो रे माहात्म्य चैतन्य का । निज स्वभाव को भूलकर, व्यर्थ जगत भटकन्त, निज के आश्रय से तुरन्त, होवे भव का अन्त। जग प्रपंच सब दूर हटाओ, सम्यक् ज्ञान कला प्रगटाओ ।। चिद्विलास में ही रम जाओ ध्यायो ध्यायो रे स्वभाव चैतन्य का । हो,,ध्यायो ध्यायो रे स्वभाव चैतन्य का आत्म दर्श सम्यक्त्व है, आत्म ज्ञान ही ज्ञान। आत्मा में थिरता चारित्र, ये ही पथ निर्वाण ।। मुक्ति वांछा भी न कराओ, पूर्ण अवांछक ही हो जाओ। अविनाशी मुक्तिपद पाओ, ये ही ऐसा ही मारग निर्वाण का हो ,,ये ही ऐसा ही मारग निर्वाण का आओ निज मंदिर में आओ, शाश्वत प्रभु का दर्शन पाओ। अनुभव अमृत पान कराओ, आया आया रे प्रसंग आनन्द का ।। हो,,आया आया रे प्रसंग आनन्द का