आत्मा हूँ न जाना तो कुछ न किया Lyerics अभिलाषा बेन
आत्मन भक्ति धारा
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आत्मा हूँ न जाना तो कुछ न किया Lyerics अभिलाषा बेन
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आत्मन भक्ति धारा
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आत्मा हूँ न माना तो कुछ न किया
निज आतम को न जाना तो व्यर्थ जिया -
काल अनंता बीता मिथ्यात्व में ही में
राग-द्वेष-पुण्य- पाप के ही कृर्तत्व में
अकर्ता प्रभु को जाने बिन व्यर्थ भ्रमा
छः द्रव्यो की सत्ता है न्यारी न्यारी
आतम प्रभु की सबसे सत्ता है निराली
ज्ञाता हूँ ,ये न जाना - तो भव भव रुला
मानकर धर्म पूजा - भक्ति उपवास में और शुभ भावों में
काया को सताने में
धर्म तो आत्म का स्वभाव है.
उसे छोड दिया
कल भी तू तो आतम था
आज भी तू आतम है पर्यायों की ओर न देख
तू ही तो परमात्म है अब तो छोड़ बहाना तुझे ये अवसर मिला
जागने की वेला की वेला आई तू अभी भी सोता है
मोका मिले न ऐसा इसको क्यो तू खोता है।
सच्चे देव - गुरु - धर्म है
पाये फिर दुःख काहे का