Перейти к содержимому

आदिवासी जीवन-दर्शन, लोकतंत्र और पहचान की लड़ाई पर जसिंता केरकेट्टा से बातचीत #kadwicoffee

Kadwi Coffee I कड़वी कॉफी

0:00 / 0:00

आदिवासी जीवन-दर्शन, लोकतंत्र और पहचान की लड़ाई पर जसिंता केरकेट्टा से बातचीत #kadwicoffee

19 929 просмотров · 4 мес. назад
Kadwi Coffee I कड़वी कॉफी
11,3 тыс. подписчиков
19 929 просмотров · 4 мес. назад
इस आत्मविध्वंसकारी समय में क्या फूल, पेड़, तितलियों और छोटी-छोटी मानवीय संवेदनाओं की बात करना भी एक राजनीतिक हस्तक्षेप हो सकता है? क्या आदिवासी जीवन-दर्शन सिर्फ एक सांस्कृतिक पहचान है, या दुनिया को देखने और जीने का एक अलग तरीका भी है? और लोकतंत्र, विकास, धर्म तथा भाषा के बदलते विमर्शों के बीच आदिवासी समाज खुद को कैसे बचाने की कोशिश कर रहा है? कड़वी कॉफी के इस एपिसोड में अपूर्वानंद की बातचीत है कवि और लेखक जसिंता केरकेट्टा से. बातचीत की शुरुआत उनके हालिया व्याख्यान "इस आत्मविध्वंसकारी समय में फूल, पत्ती, चिड़ियों की बात करना" से होती है और फिर आदिवासी जीवन-दर्शन, लोकतंत्र, धर्म, भाषा, स्त्री, प्रकृति और बदलते सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य पर विस्तार से आगे बढ़ती है. जसिंता अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर बताती हैं कि छोटी-छोटी मानवीय संवेदनाएं ही समाज में उम्मीद और इंसानियत को बचाए रखती हैं, जबकि भय, हिंसा और वर्चस्व पर आधारित व्यवस्था मनुष्य और प्रकृति दोनों को नुकसान पहुंचाती है. इस बातचीत में: — आत्मविध्वंसकारी समय में फूल, पेड़, तितलियों और छोटी-छोटी मानवीय संवेदनाओं की अहमियत. — आदिवासी जीवन-दर्शन, बराबरी, आजादी और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की अवधारणा. — जाति व्यवस्था, पितृसत्ता और आदिवासी समाज के अनुभवों पर चर्चा. — आधुनिकता, बाजार और बाहरी हस्तक्षेपों से आदिवासी समाज में आए बदलाव. — आदिवासी समाज के भीतर धर्म, पहचान और बढ़ते विभाजन. — संसदीय लोकतंत्र और चुनावी राजनीति का आदिवासी समाज पर प्रभाव. — जयपाल सिंह मुंडा, आदिवासी राजनीतिक चेतना और झारखंड आंदोलन की चर्चा. — झारखंड, छत्तीसगढ़ और दूसरे राज्यों के आदिवासी समाजों के बीच सामाजिक-राजनीतिक अंतर. — आदिवासी समाज, हिंदुत्व की राजनीति और डीलिस्टिंग के सवाल. — मातृभाषा, हिंदी और आदिवासी भाषाओं की यात्रा तथा भाषा के भीतर छिपे जीवन-दर्शन की चर्चा. जसिंता केरकेट्टा के बारे में: जसिंता केरकेट्टा कवि और लेखक हैं. वे आदिवासी अधिकारों के साथ-साथ व्यापक नागरिक अधिकारों के संघर्षों से जुड़ी रही हैं. वे झारखंड की रहने वाली हैं और भारत के साथ-साथ कई देशों की यात्राएं कर चुकी हैं. बातचीत में अपूर्वानंद उनकी पुस्तकों अंगोर, ईश्वर और बाजार, प्रेम में पेड़ होना, औरत का घर और जड़ों की जमीन का भी उल्लेख करते हैं. कड़वी कॉफी के बारे में: यह ठहरकर, इत्मीनान से की जाने वाली बातचीत का सिलसिला है. जहाँ किसी विषय पर राय रखने की जल्दी नहीं, बल्कि उसे हर नुक्ते से परखने की कोशिश होती है. 🔔 Subscribe करें और Bell Icon दबाएँ ताकि कोई कड़ी छूटे नहीं.