संचित कर्म पूर्व जन्मों का भंडार | प्रारब्ध वर्तमान देह आयु सुख दुख का कारण |
moti singh Rathore
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संचित कर्म पूर्व जन्मों का भंडार | प्रारब्ध वर्तमान देह आयु सुख दुख का कारण |
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॥🕉️कर्म मुख्यतः त्रिविध हैं ॥
१. सञ्चित कर्म
२. प्रारब्ध कर्म
३. क्रियमाण कर्म
१. सञ्चित कर्म
अनादि-अविद्या के कारण अनादि-संसार-प्रवृत्त जीव द्वारा विविध जन्मों में सम्पादित उन कर्मों का वह संस्कार-समूह, जो अभी फलारम्भ से अनारब्ध रहकर जीवाश्रय में अवस्थित है, ‘सञ्चित कर्म’ कहलाता है।
अर्थात्— जीव ने अनादि काल से जिन कर्मों का सम्पादन किया है, परन्तु जिनका फल अभी प्रकट होकर भोग के रूप में आरम्भ नहीं हुआ है, वे कर्म संस्काररूप में संचित रहते हैं। इसी कर्म-संचय को सञ्चित कर्म कहते हैं।
संक्षेप में— फलारम्भानारब्ध संस्काररूप कर्मसमूह ही सञ्चित कर्म है।
२. प्रारब्ध कर्म
सञ्चित कर्मसमूह में से वह अंश, जो फलारम्भ को प्राप्त होकर वर्तमान देह की उत्पत्ति, जीवनगत सुख-दुःखादि भोग तथा देह की आयु का निर्धारक कारण बनता है, ‘प्रारब्ध कर्म’ कहलाता है।
अर्थात्— सञ्चित कर्मों में से कुछ कर्म ऐसे होते हैं, जिनका फल आरम्भ हो चुका होता है और जो वर्तमान शरीर तथा जीवन की परिस्थितियों की उत्पत्ति के हेतु बनते हैं। वही प्रारब्ध कर्म कहलाते हैं।
संक्षेप में— फलारम्भप्राप्त सञ्चितांश तथा आयु-भोग-देहोत्पत्तिनिमित्त कर्म ही प्रारब्ध कर्म है।
३. क्रियमाण कर्म
वर्तमान देहावच्छिन्न जीव द्वारा अधुना कर्तृत्वभाव अथवा कर्तृत्वाभिमान से सम्पादित वह कर्म, जो वर्तमान में क्रियारूप से प्रवर्तमान होकर भविष्य में सञ्चित कर्मसमूह में संलग्न होता है, ‘क्रियमाण कर्म’ कहलाता है।
अर्थात्— जीव इस समय अपने कर्तृत्वभाव से जो कर्म कर रहा है और जिसका फल भविष्य में प्राप्त होगा, वही क्रियमाण कर्म है। यह आगे चलकर सञ्चित कर्मों में संलग्न होता है।
संक्षेप में— वर्तमानकाल में जीव द्वारा कर्तृत्वाभिमानपूर्वक सम्पादित तथा भविष्य में सञ्चित होने वाला कर्म क्रियमाण कर्म है।
सरल रूप में
सञ्चित — पूर्वजन्मों आदि के संचित कर्मों का वह भण्डार, जिनका फल अभी आरम्भ नहीं हुआ।
प्रारब्ध — सञ्चित कर्मों का वह भाग, जिसका फल आरम्भ हो चुका है और जो वर्तमान देह तथा उसके भोग का हेतु है।
क्रियमाण — वर्तमान में कर्तृत्वभाव से किए जा रहे कर्म, जो आगे चलकर सञ्चित में जुड़ते हैं।
Bottom Line Thumbnail में: सरल रूप : संचित = भण्डार • प्रारब्ध = भोग • क्रियमाण = वर्तमान कर्म | Karma = Stored • Allotted • Ongoing
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