कुंडलिनी शक्ती का ज्ञान और विज्ञान भाग ८ - योगिराज मनोहर हरकरे
Vaidik Vishwa
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कुंडलिनी शक्ती का ज्ञान और विज्ञान भाग ८ - योगिराज मनोहर हरकरे
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द्वितीय प्रकरण
ध्यान से समाधि
अतीन्द्रिय दिव्य अनुभव तथा उससे भी आगे ज्ञान की अवस्था प्राप्त करने का एकमात्र महाद्वार ध्यान की प्रक्रिया है। जानने योग्य विषयों में से किसी एक विषय पर मन केन्द्रित करना ही 'ध्यान' है। शास्त्रों में ध्यान को परिभाषित किया है,
'सर्व शरीरेषु चैतन्यैकाग्रता इति ध्यानं।'
शरीर में स्थित सूपर्ण चैतन्य के एकीकरण करने के प्रयत्न साधना को 'ध्यान' कहा है। इस प्रकार की प्रक्रिया से जो आराध्य रहता है वह साधक पर्यन्त पहुँचता है। 'ध्य' अर्थात् आराध्य और 'आन' अर्थात् स्वतः पर्यन्त लाना। मन का गठन ऐसा है कि वह कभी प्रकाग्र नहीं होता। परंतु ध्यान के लिए मन की एकाग्रता अत्यंत आवश्यक है। एकाग्रता कैसे साधना, इस पर गीता में कहा है,
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्याते ॥ अ.६.३५॥
अर्जुन मन का निग्रह करना कठिन ही है, परंतु सतत अभ्यास व वैराग्य से मनोनिग्रह हो सकता है। एक ही साधना बारबार करने से मन पर वे संस्कार परिणाम करते हैं, और वह उन संस्कारों के साथ रहता है। यह सब जाने अनजाने होता है। मन अर्थात् ग्रहण किये गये स्थिर संस्कारों के सिवाय कुछ नहीं है। नये संस्कार ग्रहण करने के लिए पुराने अवांछनीय संस्कारों को त्यागना पड़ता है। परंतु पुराने संस्कार दृढ़ हो जाने के कारण वे निकालते हुए भी नहीं निकलते। जैसे जैसे प्रयत्न होता है वैसे वैसे पुराने संस्कारं और अधिक दृढ़ होना चाहते हैं। उसके लिए वैराग्य अर्थात् संस्कारों पर आसक्ति कम करने का अभ्यास करना पड़ता है। वैराग्य अर्थात् आसक्तिरहित व्यवहार है। 'राग्य' अर्थात् आसक्ति, व 'वै' अर्थात् उस अवस्था से परे होना है।
वैराग्य और मन की चंचलता ध्वस्त करने के लिए मन का संयम करना तथा उसी के साथ-साथ साधना के द्वारा मन को बलपूर्वक एकाग्र करने का प्रयत्न करना नड़ता है। इसके लिए भ्रमध्य पर ध्यान करना सर्वश्रेष्ठ है। कुछ लोग धूमध्य पर सहज हो मन एकाग्र कर सकते हैं, परंतु दूसरों को यह क्लिष्ट लगता है। मन उस अवस्था में जाने कहाँ भटकता है और एकाग्रता नाम के लिए रहती है। पुरानी सभी घटनाओं का चित्रपट अविरल मन के सामने तेजी से नाचता रहता है और बीती हई आयु को घटनाओं की श्रृंखला मन के सामने एक सरीखी आती जाती है। मन की घटना (रचना) हो वैसी होने के कारण ऐसा होता है। इसीलिए उसके लिए अन्य उपाय ढूँढ़ना आवश्यक है। मन साधारणतः अवयवों पर आधारित उत्पात करता है, इसलिए अवयवों को एक ही कार्य करने के लिए लगाकर शांत करने से मन उन अवयवों के साथ अपने आप शांत व एकाग्र होता है। भ्रूमध्य में ध्यान करना कठिन लगने पर बैठक के आसन के सामने लगभग एक हाथ अंतर पर एक दीपक रख उसकी ज्योति पर ध्यान करें। इसे 'ज्योति त्राटक' कहते हैं। भ्रूमध्य के ध्यान की अपेक्षा यह ध्यान अधिक सरल है।
कुछ लोगों को केवल ज्योति पर ध्यान कर मन को एकाग्र करना भी कठिन उ होता है। मन में फिर अनेक विचार आते हैं और दृष्टि भी ज्योति पर एकाग्र नहीं हो पाती। व्यक्ति मन में विविध विचारों के साथ-साथ मानसिक चित्रपट देखता रहता है। ऐसे समय दूसरा प्रयत्न करना चाहिए। आसन में पहले चटाई, उसके ऊपर ऊनी मोटा कपड़ा, कंबल आदि। उस पर ऊपर एक शुभ्र वस्त्र बिछाकर उसके ऊपर पद्मासन लगाकर बैठें। पद्मासन लगाने से उस आसन में अधिक समय बैठना कठिन होता है। वज्रासन भी लगा कर बैठा जा सकता है, परंतु एकबार एक आसन में बैठने के पश्चात् ध्यान प्रक्रिया समाप्त होने तक उसी आसन में बैठना चाहिए। रीढ़ को सीधा रखना चाहिए। टुड्डी थोड़ा पीछे व कंधे थोड़े ऊपर उठे रहना चाहिए। बाँये हाथ की हथेली पर दाहिने हाथ की हथेली रहना चाहिए। आसन के सामने एक हाथ के अंतर पर दीपक रख उसकी ज्योति को एकटक देखें। उसी के साथ-साथ एकाद स्तोत्र स्वर में कहें तथा कहे गये स्तोत्र को कानों से सुने। आँखें ज्योति पर त्राटक ध्यान में लगी, मुख स्तोत्र कहने में मगन तथा कान उसी स्तोत्र को सुनने में लगा हुआ रखने से, वे सभी इंद्रियों सहित मन को अपने आप एकाग्र अवस्था में ले जाने को देखते हैं। इस क्रिया में स्तोत्र मुखाग्र रहना आवश्यक है। स्तोत्र समाप्त होने पर पुनः पुनः उसी स्तोत्र को दुहराना चाहिए, व त्राटक तथा सुनना लगातार चालू रखना चाहिए। स्तोत्र का उच्चारण बिल्कुल मन में न करें, ऐसा करने से नींद लगने की संभावना रहती है। स्तोत्र स्वयं सुन सकें इतने ऊंचे स्वर में रहना चाहिए।
इस प्रक्रिया में कुछ लोग स्तोत्र के बदले एकाद मंत्र का उच्चारण करते हैं, परंतु मंत्र उच्चारण करने से दो मंत्रों के बीच अंतर आता है जिसके कारण एकाग्रता खंडित सी होती है। स्तोत्र एकलय में चलने से उनका प्रवाह अविराम चलता है और उस नाद के प्रवाह में मन अपने आप एकाग्र होता है। इसे 'नादानुसंधान' कहते हैं। संस्कृत भाषा छांदस होने के कारण श्लोक साधारणतः संस्कृत भाषा में हों तो अच्छा है। हिन्दू देवी देवताओं के बिना रह नहीं सकते, इसलिए ये स्तोत्र अपने इष्ट देव के रहें। इष्ट देव के श्लोक संस्कृत में न हों, तो भगवद्गीता के कोई भी आठ दस लगातार श्लोक कंठस्थ कर उन्हें कहें। श्लोक संख्या समाप्त होने पर पुनः उन्हीं को दुहरावे। इस प्रकार बैठक धीरे-धीरे बढ़ावें। प्रथम पाँच मिनिट, फिर श्लोक को लगने वाले समय तक तत्पश्चात् एकएक स्तोत्र बढ़ाकर उसको लगने वाले समय तक बढ़ावें। इस प्रकार धीरे-धीरे ध्यान का समय डेढ़ से दो घंटे तक बढ़ावें। इतना अभ्यास होने तक ध्यान लगना शुरू होने लगता है।
लेखक - #yoga #yog #kundalini योगिराज मनोहर हरकरे