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हमेशा भटकता मन: इसकी वजह क्या है? || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2022)

शास्त्रज्ञान

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हमेशा भटकता मन: इसकी वजह क्या है? || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2022)

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🧔🏻‍♂️ आचार्य प्रशांत से मिलना चाहते हैं? लाइव सत्रों का हिस्सा बनें: https://acharyaprashant.org/hi/enquir... 📚 आचार्य प्रशांत की पुस्तकें पढ़ना चाहते हैं? फ्री डिलीवरी पाएँ: https://acharyaprashant.org/hi/books?... ➖➖➖➖➖➖ #acharyaprashant #gita #gitaupdesh #bhagwadgeeta #motivation #mukti #dhokha #ditch #vedanta #ghulam #respect #selfrespect #abhiman #swabhiman वीडियो जानकारी: गीता समागम, 22.11.2023, ग्रेटर नॉएडा Title : Bhagavad Gita Ka Gyaan: Jeevan Ka Sabse Bada Dhoka,Maya, Ahamkar Aur Mukti Ka Rahasya Kya Hai? || Acharya Prashant 📋 Video Chapters: 0:00 - Intro 0:06 - हम भ्रमित क्यों हो जाते हैं? ~ अर्जुन की जिज्ञासा 10:00 - जीवन का सबसे बड़ा धोखा क्या है? 16:49 - भगवद् गीता 3.40 : काम का संबंध इंद्रिय, मन, बुद्धि और अहंकार से 29:17 - हम जीवन का दुरुपयोग करके उसे नष्ट कैसे कर लेते हैं? 39:35 - अहंकार से मुक्त होने का सूत्र ~ श्रीकृष्ण के द्वारा 47:49 - कामनाओं की पूर्ति और हमारा अधूरापन 59:27 - दुनिया हमारा ही प्रक्षेपण है ~ अष्टावक्र गीता, 18.4 1:05:53 - ग़ुलामी का कारण क्या है? 1:13:19 - सम्मान और अभिमान में अंतर 1:21:08 - माया किसकी तलाश करती है? 1:26:09 - मुक्त पुरुषों का चरित्र और संसार में बड़ी क्रांति 1:35:29 - प्रेम और कामना में भेद 1:39:08 - नीयत साफ़ रखने का महत्व 1:49:44 - जागृत ग्रंथों की संगति और मुक्ति 1:51:44 - संयोग क्या है? उदाहरण से समझें 2:00:56 - समस्या का समाधान सवाल में नहीं, समझ में है 2:08:41 - भजन 2:12:16 - समापन विवरण: इस वीडियो में आचार्य जी ने कामना, अहंकार और आत्मज्ञान के बीच के संबंध पर गहन चर्चा की है। उन्होंने बताया कि जब व्यक्ति "मैं हूं" कहता है, तो वह अपनी अधूरापन को स्वीकार करता है, जिससे कामनाएं उत्पन्न होती हैं। कामना का उद्गम अहंकार से होता है, और यह अहंकार ही है जो व्यक्ति को भ्रमित करता है और आत्म-नाशक कर्मों की ओर ले जाता है। आचार्य जी ने यह स्पष्ट किया कि कामना और भय एक ही वस्तु के दो पहलू हैं। जब व्यक्ति अपनी कामनाओं के पीछे भागता है, तो वह अपने भीतर की अपूर्णता को महसूस करता है। उन्होंने उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि कैसे लोग बाहरी चीजों से अपनी पहचान बनाते हैं और इस प्रक्रिया में अपने असली स्वरूप को भूल जाते हैं। आचार्य जी ने यह भी बताया कि जब व्यक्ति अपने भीतर की सच्चाई को जान लेता है, तो वह कामनाओं से मुक्त हो जाता है। उन्होंने यह सुझाव दिया कि हमें अपने भीतर की गहराई में जाकर अपनी वास्तविकता को पहचानना चाहिए, और बाहरी चीजों पर निर्भरता को छोड़ना चाहिए। प्रसंग: ~ अर्जुन की जिज्ञासा : यदि सत्य सरल है तो व्यक्ति भ्रमित क्यूँ होता है? ~ व्यक्ति आत्मनाशी कर्म क्यूँ करता है? ~ काम की प्रकृति क्या है? ~ स्वयं के प्रति अज्ञान क्या है? ~ मैं कौन हूँ? बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख । माँगन से मरना भला, यह सतगुरु की सीख ।। ~ संत कबीर आग दहके पर धुएँ से प्रकाश ढक सा जाता है काम भरा जब आँख में, सच नज़र नहीं आता है (आचार्य प्रशांत द्वारा काव्यात्मक अर्थ) ~ भगवद गीता 3.38 बिनु सत्संग विवेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ॥ ~ संत तुलसीदास संगीत: मिलिंद दाते ~~~~~