जो लुभाता है… वही रुलाता क्यों है? || आचार्य प्रशांत, शून्यता सप्तति पर (2024)
शास्त्रज्ञान
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जो लुभाता है… वही रुलाता क्यों है? || आचार्य प्रशांत, शून्यता सप्तति पर (2024)
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वीडियो जानकारी: 12.09.2024, बोध प्रत्यूषा, गोवा
Title : जो लुभाता है… वही रुलाता क्यों है? || आचार्य प्रशांत, शून्यता सप्तति पर (2024)
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विवरण:
इस वीडियो में आचार्य जी ने समझाया है कि मनुष्य का मूल दुख किसी बाहरी परिस्थिति से नहीं, बल्कि उसकी अपनी कामनाओं और अधूरेपन की भावना से उत्पन्न होता है। गौतम बुद्ध के चार आर्य सत्य के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि दुख जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है और यह कामना के साथ ही उत्पन्न होता है। व्यक्ति सीधे दुख को नहीं बुलाता, बल्कि कामनाओं को आमंत्रित करता है, और उन्हीं के साथ दुख स्वतः आ जाता है। आगे नागार्जुन के भाव-अभाव के सिद्धांत से समझाया गया है कि जिस वस्तु की इच्छा की जाती है, वह अपने अभाव के साथ ही आती है, इसलिए कोई भी प्राप्ति स्थायी संतोष नहीं दे सकती। मन की भूख वस्तुओं से नहीं मिटती क्योंकि वह अभाव से नहीं, बल्कि अतिरिक्तता और भ्रम से उत्पन्न होती है। मुक्ति का मार्ग बाहर कुछ जोड़ने में नहीं, बल्कि कामना को समझकर उससे मुक्त होने में है।
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संगीत: मिलिंद दाते
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