तप से कर्म निर्जरा कैसे होती है? अनुमोदना का भी मिलता है लाभ | Mahendra Rishi Ji | 06.09.2026
AnandMahendraVani и CHAPLOT MEDIA CONCEPT
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📿 आनंद अनुभूति चातुर्मास — भीलवाड़ा 2026
🙏 सिद्धितप • आयंबिल • उपवास तप आराधना विशेष
📅 6 सितंबर 2026
📍 शांतिभवन, भीलवाड़ा
श्रमणसंघीय युवाचार्य प्रवर परम पूज्य श्री महेन्द्र ऋषिजी म.सा. ने स्थानांग सूत्र के आधार पर तप, वेदना, कर्मों की उदीरणा, निर्जरा और तपस्वियों की अनुमोदना का गहरा आध्यात्मिक अर्थ समझाया।
परमात्मा के सूत्र का विवेचन करते हुए युवाचार्यश्री ने बताया कि जीवन में कष्ट दो प्रकार से सामने आ सकता है।
एक वह, जो परिस्थिति के कारण अपने आप आ गया।
दूसरा वह, जिसे साधक ने जागरूकता और संकल्पपूर्वक साधना के लिए स्वीकार किया।
बीमारी आने पर भोजन में परहेज करना मजबूरी हो सकती है, परिस्थितिवश कई दिनों तक भोजन न मिलना भी वेदना हो सकती है।
लेकिन—
स्वेच्छा से, समझपूर्वक और निर्जरा के भाव से लिया गया तप साधना बन जाता है।
इसीलिए उपवास, आयंबिल और दूसरी तप आराधनाएं केवल खाने-पीने का त्याग नहीं हैं।
उनका मूल उद्देश्य है—
कर्मों की निर्जरा।
कर्म निर्जरा के भाव से।
▶️ पूर्ण प्रवचन देखें:
/ @anandmahendravani
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