अहोई अष्टमी व्रत कथा, आरती एवं महत्व #अहोईअष्टमी #अष्टमीतिथि #ahoiasthamivratkatha #ahoimata
Atharvaveda -- अथर्ववेद
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अहोई अष्टमी व्रत कथा, आरती एवं महत्व #अहोईअष्टमी #अष्टमीतिथि #ahoiasthamivratkatha #ahoimata
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अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और उज्जवल भविष्य के लिए यह निर्जला व्रत रखती हैं।
1. अहोई अष्टमी व्रत कथा
प्राचीन काल में एक शहर में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे और एक बेटी थी। दीपावली से कुछ दिन पहले साहूकार की बेटी और उसकी भाभियां घर की लीपापोती और मरम्मत के लिए जंगल से मिट्टी लेने गईं।
वहां मिट्टी खोदते समय अनजाने में साहूकार की बेटी की कुदाल से स्याहू (सेह) के बच्चे की चोट लगने से मृत्यु हो गई। इससे क्रोधित होकर स्याहू माता (अहोई माता) ने शाप दिया कि जैसे उसने उसके बच्चे को मारा है, वैसे ही उसके वंश की संतानों का नाश होगा।
घर लौटने पर साहूकार की छोटी बहू को अपनी ननद पर दया आई और उसने अपनी कोख बंधवा ली (अर्थात सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली)। इसके बाद छोटी बहू के जितने भी बच्चे हुए, वे सात दिन के भीतर ही मर जाते थे। दुखी होकर उसने किसी ज्ञानी/पंडित से सलाह ली। पंडित जी ने उसे पश्चाताप करने और अहोई माता (स्याहू माता) की शरण में जाकर क्षमा मांगने को कहा।
छोटी बहू ने सच्चे मन से कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उपवास रखा, दीवार पर स्याहू और उसके बच्चों का चित्र बनाकर विधि-विधान से पूजा की और भूल के लिए क्षमा मांगी। उसकी तपस्या और पश्चाताप से प्रसन्न होकर अहोई माता ने उसे क्षमा कर दिया और उसके सभी सातों पुत्र जीवित हो गए। तभी से संतान की रक्षा के लिए यह व्रत किया जाने लगा।
2. अहोई माता की आरती
जय अहोई माता, जय अहोई माता ।
तुमको निसदिन ध्यावत हरि विष्णु धाता ॥
ब्रह्माणी रुद्राणी कमला तू ही है जगदाता ।
जो कोई तुमको ध्यावत नित मंगल पाता ॥
तू ही है पाताल बसंती तू ही है सुखदाता ।
कर्म प्रभाव प्रकाशक जगनिधि से त्राता ॥
जिस घर थारो वास वही में गुण आता ।
कर न सके सोई कर ले मन नहीं घबराता ॥
तुम बिन सुख न होवे पुत्र न कोई पाता ।
खान पान का वैभव तुम बिन नहीं आता ॥
शुभ गुण सुन्दर युक्ता क्षीर निधि जाता ।
रतन चतुर्दश तोंकू कोई नहीं पाता ॥
श्री अहोई माँ की आरती जो कोई गाता ।
उर उमंग अति उपजे पाप उतर जाता ॥
(आरती के बाद भूल-चूक के लिए अहोई माता से क्षमा-याचना जरूर करें।)
3. अहोई अष्टमी का महत्त्व
संतान की दीर्घायु: यह व्रत विशेष रूप से संतान के संकटों को दूर करने और उनकी लंबी आयु के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।
माता का प्रेम व त्याग: यह व्रत मातृ-भाव, संकल्प और बच्चों के प्रति माता के अटूट प्रेम व समर्पण को दर्शाता है।
पापों का प्रायश्चित: इस दिन सच्चे मन से कथा सुनने और पूजन करने से अनजाने में हुए पाप नष्ट होते हैं।
4. अहोई अष्टमी पर विशेष उपाय और नियम
क्या करें:
घर की दीवार या कागज पर गेरू/चित्र से स्याहू (सेह) और उसके सात बच्चों का चित्र बनाएं और उसकी पूजा करें।
तारे या चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत का पारण (खोलना) करें।
चांदी की अहोई (स्याहू) की माला बनवाकर उसकी पूजा करें और गले में धारण करें।
क्या न करें:
इस दिन सुई-धागे का इस्तेमाल बिल्कुल न करें, सिलाई-कढ़ाई पूरी तरह वर्जित होती है।
चाकू या किसी नुकीली वस्तु से फल-सब्जियां न काटें।
व्रत के दिन तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस-मदिरा) का सेवन भूलकर भी न करें; पारण के बाद सात्विक भोजन ही ग्रहण करें