कठपुतली सा नाचे रे 🎭 | धन, मान, मोह की डोरी | कबीर प्रेरित निर्गुण भजन | Lyrical Video
Divine Bhakti Vibes
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कठपुतली सा नाचे रे 🎭 | धन, मान, मोह की डोरी | कबीर प्रेरित निर्गुण भजन | Lyrical Video
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🎭 कठपुतली सा नाचे रे | कबीर प्रेरित निर्गुण भजन | Lyrical Video
क्या सच में इंसान अपनी मर्ज़ी से जीता है? या धन, मान, मोह, लोभ, क्रोध, डर और झूठी शान की डोरियाँ उसे कठपुतली की तरह नचाती रहती हैं?
“कठपुतली सा नाचे रे” एक गहरा, आत्मचिंतन से भरा कबीर-प्रेरित निर्गुण भजन है, जो हमें अपने भीतर छिपे उन बंधनों को पहचानने की प्रेरणा देता है, जिन्हें हम अक्सर अपनी मर्ज़ी समझ बैठते हैं।
धन कमाने की दौड़, मान-सम्मान का अभिमान, अपनों को खोने का डर, क्रोध में टूटते रिश्ते और दुनिया के सामने झूठी शान बनाए रखने की चाह — क्या यही हमारी स्वतंत्रता है?
इस भजन का संदेश है कि धन हो, लेकिन लोभ न बाँधे; मान मिले, लेकिन अहंकार न बढ़े; मोह हो, लेकिन वह हमें जकड़े नहीं। जब इंसान अपने मन की गाँठों को पहचानने लगता है, तभी सच्ची मुक्ति की राह खुलती है।
🙏 भजन की सबसे गहरी पुकार:
“और फिर कहे…
मेरी मर्ज़ी!”
कबीर साहेब की निर्गुण वाणी से प्रेरित इस रचना को सुनिए, महसूस कीजिए और अपने मन से एक सवाल पूछिए — डोरी किसके हाथ रे?
🎵 SONG LYRICS — कठपुतली सा नाचे रे
[INTRO — Very Soft / Tanpura + Bansuri]
अरे बंदे…
कहता है — मेरी मर्ज़ी,
मेरे हाथ कमान…
कभी ये भी सोचा रे,
जिस राह पे तू चलता है,
जिस साँस पे इतराए…
जिस डोरी को देख न पाए,
वही तुझे नचाए।
[Short Bansuri Pause]
कठपुतली सा नाचे रे,
मनवा नाचे रे…
किस-किस डोरी बँधा है बंदे,
गिनता जाए रे…
कठपुतली सा नाचे रे…
[VERSE 1 — Storytelling / Gentle Dholak]
धन की डोरी पहली डोरी,
दिन-रात दौड़ाए…
जितना जोड़ के रखता बंदा,
उतना लोभ बढ़ाए।
मान की डोरी दूजी डोरी,
ऊँचा खुद को माने…
कोई बात न माने उसकी,
रातों नींद गँवाए।
मोह की डोरी तीसरी डोरी,
अपनों में उलझाए…
पकड़े जितना कसकर उनको,
उतना डर सताए।
तीनों डोरी तन को नचाएँ,
मन को चैन न आए…
अपनी मर्ज़ी कहने वाला,
डोरी गिन न पाए।
[CHORUS — Wider / Bansuri Response]
कठपुतली सा नाचे रे,
मनवा नाचे रे…
धन की, मान की, मोह की डोरी,
दिन-रैन नचाए रे…
लोभ की डोरी खींचे आगे,
डर की पीछे लाए रे…
कठपुतली सा नाचे रे,
मनवा नाचे रे…
[VERSE 2 — Deeper / Sarangi Enters]
लोभ की डोरी चौथी डोरी,
भरने पर भी खाली…
जितना पाए, और वो चाहे,
कभी न माने खुशहाली।
क्रोध की डोरी पाँचवीं डोरी,
पल में आग लगाए…
बात ज़रा-सी चुभ जाए तो,
अपना-पराया भुलाए।
डर की डोरी छठी डोरी,
सच कहने से रोके…
जग क्या बोले, लोग हँसेंगे,
मन को भीतर टोके।
झूठी शान की सातवीं डोरी,
सच से दूर भगाए…
दूजे आगे झुकना पड़े तो,
मन ही मन अकड़ दिखाए।
सात-सात डोरी बाँध के बैठा,
कहे — मेरी मर्ज़ी…
कठपुतली की चाल न समझे,
किसकी चले खुदगर्ज़ी?
[INSTRUMENTAL INTERLUDE — Sarangi + Bansuri]
Sarangi plays a questioning folk phrase, as if each string is being revealed one by one. Bansuri answers with a soulful, haunting melody. Soft dholak and ektara continue underneath. No vocals.
[BRIEF SILENCE — 1 sec]
[SPOKEN — Deep / Intimate / Tanpura Only]
अरे मनवा…
धन की डोरी खींचे,
तो धन के पीछे भागे…
मान की डोरी खींचे,
तो जग से मान माँगे…
मोह की डोरी खींचे,
तो छूटने से काँपे…
क्रोध की डोरी खींचे,
तो अपनों पर ही बरसे…
और फिर कहे…
मेरी मर्ज़ी!
[2-SECOND SILENCE]
[VERSE 3 — Emotional Lift / Gradually Building Dholak]
डोरी अपनी पहचान ले बंदे,
गाँठ-गाँठ खुलवाए…
धन रहे पर लोभ न बाँधे,
मान रहे न भरमाए।
मोह रहे पर मोह न जकड़े,
क्रोध न मन को खाए…
डर के आगे सच न छोड़े,
झूठी शान मिटाए।
डोरी टूटे एक-एक करके,
मन में उजियारा…
तब कठपुतली कौन नचाए,
जब मन हुआ तुम्हारा?
[CHORUS — Biggest / Full Folk Ensemble]
कठपुतली सा नाचे रे,
मनवा नाचे रे…
धन की, मान की, मोह की डोरी,
दिन-रैन नचाए रे…
लोभ की डोरी खींचे आगे,
डर की पीछे लाए रे…
कठपुतली सा नाचे रे,
मनवा नाचे रे…
क्रोध की डोरी, झूठी शान,
मन को भरमाए रे…
गाँठ खुली तो बंदा जाने,
कौन किसे नचाए रे…
डोरी किसके हाथ रे?
किसकी चले मनमानी?
कठपुतली सा नाचे रे,
खोल अपनी कहानी…
[FINAL SPOKEN TAG — Very Soft / Tanpura Only]
कबिरा पूछे बंदे से…
डोरी को दोष न दे…
पहले गाँठ तो देख…
धन तेरा मालिक कब बना?
मान तेरा बंधन कब बना?
जिस दिन डोरी पहचान गया…
उस दिन नाच समझ गया।
[OUTRO — Gradually Stripped Down / Bansuri + Tanpura]
धन की डोरी…
मान की डोरी…
मोह की डोरी…
लोभ की डोरी…
क्रोध की डोरी…
डर की डोरी…
झूठी शान की डोरी…
एक-एक गाँठ…
खुलती जाए…
मनवा धीरे…
थमता जाए…
कठपुतली…
सा नाचे रे…
डोरी किसके हाथ…
अब मन जाने रे…
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