हरि अनंत… हरि नाम अनंत | एक ही साँस में, सारा संसार | कबीर प्रेरित भजन | Lyrical Video
Divine Bhakti Vibes
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हरि अनंत… हरि नाम अनंत | एक ही साँस में, सारा संसार | कबीर प्रेरित भजन | Lyrical Video
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हरि अनंत… हरि नाम अनंत… 🙏
एक कबीर प्रेरित निर्गुण भजन — “हरि अनंत”।
यह भजन उस अनंत हरि की खोज की बात करता है, जिसे हम अक्सर बाहर ढूँढ़ते रहते हैं, जबकि वही हरि हर साँस में, हर जीव में और हर प्रेम में बसा है।
माँ की ममता में, पिता के त्याग में, बालक की मुस्कान में, दुखियारे की दुआ में — हर जगह उसी एक हरि की झलक है।
हवा भेद नहीं पूछती,
सूरज किसी से हिसाब नहीं रखता,
नदिया जात-पंथ नहीं पूछती,
फिर इंसान ने अपने बीच मेरा-तेरा क्यों बना लिया?
कबीर की निर्गुण दृष्टि से प्रेरित यह भजन हमें भीतर देखने और प्रेम, करुणा तथा समानता को जीवन में उतारने की याद दिलाता है।
“हरि को पाने से पहले,
हरि जैसी कर प्रीत।”
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🎵 हरि अनंत — Lyrics
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तू नाम गिने, वो साँस गिने,
तू रूप गिने, वो प्राण।
जिस ओर नज़र उठे तेरी,
वहीं मिले भगवान।
तू उसे खोजे मूरत में, वो समाया माँ की ममता में।
तू ढूँढ़े उसे तीरथ में, वो झलके पिता के त्याग में।
तू माँगे उसे मन्नतों में, वो हँसे बालकों की सूरत में।
तू हाथ उठाए अंबर को, वो मिले दुखियारे की दुआ में।
काहे बाहर ढूँढ़े?
घट-घट में वो बसे,
तू दर-दर क्यों घूमे?
हरि अनंत… हरि नाम अनंत…
काहे दूर तू जावे?
जिसे खोजे जग सारा,
वो मन में ही गावे।
तू खुद को बड़ा कहे,
दूजे को दे दोष।
हरि को बाँट के बैठा,
मन में भरा रोष।
रंग देखे, रूप देखे,
भीतर देखा न ज्ञान।
कबिरा हँस के पूछे,
कहाँ खोजे भगवान?
कबिरा कहे…
अगर सातों समंदर की स्याही बन जाए…
दुनिया के सारे जंगलों की कलम…
और इस पूरी धरती को कागज़ बना लूँ…
तब भी मेरे साहिब की महिमा
लिखी न जाए…
हवा चले, भेद न पूछे,
किसका घर, किस गाँव।
सूरज धूप लुटाता जाए,
न रखे कोई हिसाब।
नदिया जल सबको देवे,
न पूछे जात-पंथ।
पेड़ खड़ा फल बाँट रहा,
सबके लिए अनंत।
धरती सबको गोद में लेती,
आकाश करे विस्तार।
हरि का रंग कहाँ बँट पाया,
कौन कहे मेरा-तेरा?
तू भी थोड़ा हरि सा हो,
छोड़ दे अपना मान।
जिसको धूप कम मिली जग में,
उसको दे दे छाँव।
जिसकी आँख में नीर भरा,
उसका बन जा गीत।
हरि को पाने से पहले,
हरि जैसी कर प्रीत।
जिसको अपना कहता तू,
उसमें वही साँस।
जिसको पराया कहता तू,
उसमें वही प्रकाश।
हरि अनंत…
हरि नाम अनंत…
तेरा “मैं” मिटे…
वो दिखे अनंत…
हरि अनंत…
हरि नाम अनंत…
तू-मैं छूटे…
बचे अनंत…
हरि अनंत…
हरि नाम अनंत…
घट-घट गूँजे
एक ही तान…
हरि अनंत…
हरि नाम अनंत…
कबिरा कहे…
मैं हट गया,
तो वो दिखा।
हरि कहीं गया ही नहीं…
वो यहीं था।
मेरी साँस में…
तेरी साँस में…
हर साँस में…
हरि अनंत…
हरि नाम अनंत…
एक ही धागा, एक ही जग…
एक ही साँस का खेल…
हरि अनंत…
हरि नाम अनंत…
मेरा-तेरा छोड़ मनवा…
यही हरि का मेल…
हरि अनंत…
हरि नाम अनंत…
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🙏 एक सवाल आपके लिए
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अगर हरि हर साँस में है,
तो आपके जीवन में ऐसी कौन-सी चीज़ है
जिसे आप आज भी बाहर खोज रहे हैं?
अपने विचार कमेंट में जरूर लिखें। ❤️
हरि अनंत… हरि नाम अनंत… 🙏
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