देवी दुर्गा की आत्मकथा 1| दर्द भरी कहानी देवी दुर्गा की जबानी
JAGO PANCH
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देवी दुर्गा की आत्मकथा 1|एक दर्द भरी दास्तान
महिषासुर मर्दिनी देवी दुर्गा (मेरी कहानी मेरा अन्तर्द्वन्द)
मंदार पर्वत की उतुंग शिखर. शिखर के उपर प्रौढ़ा नारी. नीचे गंगा की कलकल जल धारा. प्रौढ़ा ने दोनों हाथ जोड कर कहा- 'हे गंगे, हिमालय की छाती से निकली जलधारा में जिस प्रकार तूं विलीन हो गई और अपना नाम उस जलधारा को देकर अमर हुई उसी प्रकार मैं तुम्हारे पास आ रही हूँ. मेरा अन्तर्द्वन्द बार-बार कह रहा है- "तुने भारत के मूल निवासी राजाओं की हत्या की है. लाखों मूल निवासियों को जंगली जीवन जीने के लिए बाध्य किया है. जो भाग नहीं सके उसे शुद्र-अतिशुद्र बनाने का प्रथम श्रेय तुम्हारा ही है. तुं ने प्रकृति को धोखा दिया है. अब तुम्हें जिन्दा रहने का कोई औचित्य नहीं है." इतना कहते-कहते उछलती-कूदती गंगा की जलधारा में वह प्रौढ़ा कूद गई. गंगा की जलधारा उसे अपने गोद में लेकर वहाँ ले गई, जहाँ एक नाविक प्रवीण निषाद मछली पकडने में व्यस्त था. नाविक ने देखा और उसे निकाल कर घर ले गया. प्रौढ़ा अब भी बेहोश थी. वैद्यराज महेन्द्र किसकू ने उपचार आरम्भ किया. पेट से पानी भी निकाला पर न आँखे खुली न होश आया. इस प्रौढ़ा को देखने के लिए गाँव-गाँव से लोग आने लगे. देखते ही देखते हजारों की भीड लग गई. बैद्यराज महेन्द्र किसकू ने लोंगो को आश्वासन देते हुए कहा- आप सभी धैर्य रखें. इसकी जीवन शक्ति अभी मौजूद है. इसके पेट का पानी तो निकल गया है पर इसके मस्तिष्क पर चिन्ताओं का भारी आघात हुआ है. इसी कारण होश आने में बिलम्ब है.
चिन्ता ऐसी डाकिनी, काट कलेजा खाय।
बैद्य बेचारा क्या करे, कब तक दवा खिलाए ।।
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