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श्री आदिनाथ भगवान चालीसा | जय जय आदिनाथ जिन स्वामी | ऋषभदेव प्रभु की महिमा

Jinbhakt

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श्री आदिनाथ भगवान चालीसा | जय जय आदिनाथ जिन स्वामी | ऋषभदेव प्रभु की महिमा

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🙏 जय जिनेन्द्र 🙏 प्रथम तीर्थंकर, आद्य तीर्थप्रवर्तक एवं मानव सभ्यता को जीवनोपयोगी कलाओं का ज्ञान देने वाले भगवान श्री आदिनाथ (ऋषभदेव) स्वामी को समर्पित यह पावन श्री आदिनाथ भगवान चालीसा भक्तिभाव, श्रद्धा और आत्मकल्याण की प्रेरणा से परिपूर्ण है। भगवान आदिनाथ ने मानव समाज को कृषि, व्यापार, लिपि, गणना, शासन व्यवस्था तथा धर्ममार्ग का ज्ञान प्रदान कर कर्मभूमि का शुभ आरम्भ किया। उन्होंने वैराग्य धारण कर तप किया, केवलज्ञान प्राप्त किया और अनंत जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश दिया। इस चालीसा में भगवान आदिनाथ के जन्म, वैराग्य, दीक्षा, तप, केवलज्ञान, पुत्र भरत चक्रवर्ती एवं बाहुबली की गौरवगाथा तथा उनके दिव्य जीवन के अनेक प्रेरणादायक प्रसंगों का वर्णन किया गया है। जो श्रद्धापूर्वक भगवान आदिनाथ का स्मरण करता है, उसके जीवन में धर्म, संयम, शांति और आत्मकल्याण के शुभ संस्कार जागृत होते हैं। 📜 Lyrics: शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन को, करूँ प्रणाम। उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी नाम॥ सर्व साधु और सरस्वती जिन मन्दिर सुखकार। आदिनाथ भगवान को मन मन्दिर में धार॥ जै जै आदिनाथ जिन स्वामी, तीनकाल तिहूँ जग में नामी। वेष दिगम्बर धार रहे हो, कर्मों को तुम मार रहे हो॥ हो सर्वज्ञ बात सब जानो, सारी दुनिया को पहचानो। नगर अयोध्या जो कहलाये, राजा नाभिराज बतलाये॥ मरुदेवी माता के उदर से, चैत वदी नवमी को जन्मे। तुमने जग को ज्ञान सिखाया, कर्मभूमी का बीज उपाया॥ कल्पवृक्ष जब लगे बिछरने, जनता आई दुखड़ा कहने। सब का संशय तभी भगाया, सूर्य चन्द्र का ज्ञान कराया॥ खेती करना भी सिखलाया, न्याय दण्ड आदिक समझाया। तुमने राज किया नीति का, सबक आपसे जग ने सीखा॥ पुत्र आपका भरत बताया, चक्रवर्ती जग में कहलाया। बाहुबली जो पुत्र तुम्हारे, भरत से पहले मोक्ष सिधारे॥ सुता आपकी दो बतलाई, ब्राह्मी और सुन्दरी कहलाई। उनको भी विद्या सिखलाई, अक्षर और गिनती बतलाई॥ एक दिन राजसभा के अन्दर, एक अप्सरा नाच रही थी। आयु उसकी बहुत अल्प थी, इसीलिए आगे नहीं नाच रही थी॥ विलय हो गया उसका सत्वर, झट आया वैराग्य उमड़कर। बेटों को झट पास बुलाया, राज पाट सब में बंटवाया॥ छोड़ सभी झंझट संसारी, वन जाने की करी तैयारी। राव हजारों साथ सिधाए, राजपाट तज वन को धाये॥ लेकिन जब तुमने तप कीना, सबने अपना रस्ता लीना। वेष दिगम्बर तजकर सबने, छाल आदि के कपड़े पहने॥ भूख प्यास से जब घबराये, फल आदिक खा भूख मिटाये। तीन सौ त्रेसठ धर्म फैलाये, जो अब दुनिया में दिखलाये॥ छः महीने तक ध्यान लगाये, फिर भोजन करने को धाये। भोजन विधि जाने नहिं कोय, कैसे प्रभु का भोजन होय॥ इसी तरह बस चलते चलते, छः महीने भोजन बिन बीते। नगर हस्तिनापुर में आये, राजा सोम श्रेयांस बताए॥ याद तभी पिछला भव आया, तुमको फौरन ही पड़गाया। रस गन्ने का तुमने पाया, दुनिया को उपदेश सुनाया॥ तप कर केवल ज्ञान पाया, मोक्ष गए सब जग हर्षाया। अतिशय युक्त तुम्हारा मन्दिर, चांदखेड़ी भंवरे के अन्दर॥ उसका यह अतिशय बतलाया, कष्ट क्लेश का होय सफाया। मानतुंग पर दया दिखाई, जंजीरें सब काट गिराई॥ राजसभा में मान बढ़ाया, जैन धर्म जग में फैलाया। मुझ पर भी महिमा दिखलाओ, कष्ट भक्त का दूर भगाओ॥ पाठ करे चालीस दिन, नित चालीस ही बार। चांदखेड़ी में आय के, खेवे धूप अपार॥ जन्म दरिद्री होय जो, होय कुबेर समान। नाम वंश जग में चले, जिनके नहीं सन्तान॥ 🎵 यदि यह प्रस्तुति आपको पसंद आए तो LIKE, SHARE और COMMENT अवश्य करें तथा JinBhakt चैनल को SUBSCRIBE करना न भूलें। #AdinathChalisa #RishabhdevBhagwan #AdinathBhagwan #JainBhakti #JainChalisa #Jainism #DigambarJain #JinBhakt #JainSongs #JainDevotional #Rishabhdev #AdinathSwami #JainStavan #JainBhajan #JaiJinendra #Tirthankar #FirstTirthankar #JainCulture #JainSpirituality #BhaktiGeet