दशलक्षण पर्व आने वाला है | दस धर्मों की अमृतधारा | जैन भक्ति गीत
Jinbhakt
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दशलक्षण पर्व आने वाला है | दस धर्मों की अमृतधारा | जैन भक्ति गीत
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🙏 जय जिनेन्द्र 🙏
दिगम्बर जैन परम्परा के परम पावन दशलक्षण महापर्व के आगमन को समर्पित यह भक्तिमय प्रस्तुति आत्मजागरण, धर्मचिंतन और आत्मकल्याण का मंगल संदेश लेकर आई है। दशलक्षण पर्व आत्मा के दस श्रेष्ठ गुणों — उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य — के चिंतन और साधना का महान अवसर है।
इन दस दिनों में साधक अपने भीतर छिपे कषायों को पहचानकर उन्हें क्षीण करने का प्रयास करता है तथा जिनवाणी के प्रकाश में आत्मा के वास्तविक स्वरूप का अनुभव करने की दिशा में अग्रसर होता है। यह पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम और मोक्षमार्ग की ओर बढ़ने का दिव्य निमंत्रण है।
इस भजन के माध्यम से आइए, हम सभी दशलक्षण पर्व के स्वागत हेतु अपने मन-मंदिर को तैयार करें और जिनेन्द्र भगवान की वीतराग वाणी को जीवन में उतारने का संकल्प लें।
📜 Lyrics:
भादों शुक्ल की शुभ बेला अब, धीरे-धीरे पास है।
दशलक्षण का महापर्व आने वाला, धर्म जागरण का प्रकाश है॥
जिनवाणी का अमृत लेकर, फिर से संदेशा लाया है।
सोई आत्मा को जगाने, दशलक्षण पर्व आने वाला है॥
दशलक्षण पर्व आने वाला है, आतम भाव जगाने वाला है।
दस धर्मों की अमृतधारा, जीवन में बरसाने वाला है॥
क्षमा का संदेश लाने वाला है, अंतर मल धुलवाने वाला है।
मोक्षमार्ग की ओर बढ़ाने, दशलक्षण पर्व आने वाला है॥
घर-घर में अब धर्म सजाओ, मन मंदिर को स्वच्छ बनाओ।
मिथ्या भावों को दूर हटाकर, जिनवाणी का पथ अपनाओ॥
दस दिन आत्मचिंतन करने, शुभ अवसर आने वाला है।
भवसागर से पार उतारे, ऐसा पर्व आने वाला है॥
पहला दिन क्षमा का होगा, क्रोध अग्नि को शांत करेगा।
शत्रु-मित्र सब एक समान हों, ऐसा भाव प्रदान करेगा॥
मार्दव का मंगल संदेशा, अभिमान मिटाने वाला है।
नम्रता की निर्मल गंगा, मन में बहने वाला है॥
आर्जव बोले सरल बनो तुम, मन में कपट न रहने पाए।
जैसा अंतर वैसा बाहर, जीवन निर्मल बनता जाए॥
शौच धर्म संतोष सिखाए, लोभ मिटाने वाला है।
जो है उसमें सुख मिल जाए, यह समझाने वाला है॥
दशलक्षण पर्व आने वाला है, आतम भाव जगाने वाला है।
दस धर्मों की अमृतधारा, जीवन में बरसाने वाला है॥
क्षमा का संदेश लाने वाला है, अंतर मल धुलवाने वाला है।
मोक्षमार्ग की ओर बढ़ाने, दशलक्षण पर्व आने वाला है॥
सत्य धर्म का सूरज लेकर, पांचवाँ दिन आएगा।
हितकर वाणी, मधुर व्यवहार, जीवन को महकाएगा॥
संयम की पावन सरिता फिर, अंतर में बहने वाली है।
इन्द्रिय विजय की राह दिखाकर, दिशा नई देने वाली है॥
तप का पर्व बुला रहा है, कर्मों को गलाने हेतु।
त्याग पुकारे छोड़ ममता, आत्मा को अपनाने हेतु॥
आठवाँ त्याग धर्म बताए, देने में ही सुख होता।
जो कुछ अपना मान रहे थे, सब क्षणभंगुर ही होता॥
आकिंचन्य का भाव जगाकर, ममता दूर हटाएगा।
ब्रह्मचर्य का शुभ संदेशा, अंतर में समाएगा॥
दस धर्मों की साधना करके, आतम ज्योति प्रकट होगी।
जिनवर के दिखलाए पथ पर, चलने की फिर ललक होगी॥
अनन्त चतुर्दशी के दिन, धर्म विजय मुस्काएगी।
क्षमावाणी बनकर दुनिया, प्रेम सुधा बरसाएगी॥
दशलक्षण पर्व आने वाला है, आतम भाव जगाने वाला है।
दस धर्मों की अमृतधारा, जीवन में बरसाने वाला है॥
क्षमा-मार्दव-आर्जव गाओ, शौच-सत्य अपनाओ रे।
संयम-तप-त्याग जगाओ, आकिंचन-ब्रह्मचर्य अपनाओ रे॥
आओ मिलकर धर्म मनाएँ, आतम का उत्सव आए।
दस धर्मों की पावन गंगा, जीवन को पवित्र बनाए॥
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