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युगल माधुरी ध्यान धरो मन | Dharo Man! Yugal Madhuri Ko Dhyan (Prem Ras Madira - Braj Parikari Ji)

Bishwas Pandey

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युगल माधुरी ध्यान धरो मन | Dharo Man! Yugal Madhuri Ko Dhyan (Prem Ras Madira - Braj Parikari Ji)

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Bishwas Pandey
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Written & Composed by Jagadguttam Shri Kripalu Ji Maharaj Book 📖: Prem Ras Madira - Yugal Madhuri 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 धरो मन ! युगल-माधुरी ध्यान । मनमोहन-मोहिनि श्यामा अरु, मोहिनि-मोहन कान्ह । इन दोउन कहँ बिलग न मानिय, द्वै देही इक प्रान । पै लीला-बिलास महँ मोहन, अनुचर, रसिक प्रमान । रिझवत नित निकुंज श्यामा कहँ, मरम न सक कोउ जान। यह 'कृपालु' रस रसिकहिं जानत, जो नित कर रह पान ।। भावार्थ- अरे मन ! तू प्रिया-प्रियतम की रूपमाधुरी का निरंतर ही ध्यान किया कर। श्यामसुन्दर को मोहित करने वाली किशोरीजी एवं किशोरीजी को मोहित करने वाले श्यामसुन्दर हैं । अरे मन ! इन दोनों को भिन्न न समझना, इन दोनोंके देह तो दो अवश्य हैं किन्तु प्राण एक ही हैं। हाँ रसिकों के सिद्धांतों के अनुसार लीला-विलासके क्षेत्र में श्यामसुन्दर दास अवश्य हैं, तथा नित्य ही निकुजों के मध्य में विविध प्रकार से किशोरीजी को रिझाया करते हैं। इस मर्मको रसिकों के सिवा और कोई भी नहीं जान सकता । “कृपालु' कहते हैं कि इस निकुंज-रस-माधुरी को रसिक ही जानते हैं, जो कि इस रसका निरन्तर ही पान किया करते हैं। 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸