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USA Retreat - शील केवल नियम नहीं, मन को बदलने का प्रशिक्षण है

Dhamma Essence - Understanding Buddha Dhamma

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USA Retreat - शील केवल नियम नहीं, मन को बदलने का प्रशिक्षण है

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Dhamma Essence - Understanding Buddha Dhamma
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YouTube की सीमा वास्तव में लगभग 5000 characters की होती है, 5000 words की नहीं। इसलिए मैंने इसे काफी संक्षिप्त रखा है और emojis, markdown, arrows तथा अन्य decorative special characters हटा दिए हैं। इस वीडियो में विलास जी शील, कर्म, जीवन के वास्तविक उद्देश्य, आभासार लोक, साधना के क्रम और निर्वाण के विषय में विस्तार से चर्चा करते हैं। बुद्ध धम्म को समझने से पहले सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि मनुष्य का जीवन किस उद्देश्य के लिए है। धन, परिवार, प्रतिष्ठा और सुख सुविधाएं होने के बाद भी मृत्यु निश्चित है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को यह विचार करना चाहिए कि मृत्यु के बाद क्या होगा और जन्म मरण की इस प्रक्रिया से बाहर निकलने का मार्ग क्या है। विलास जी अपने व्यक्तिगत अनुभव का उल्लेख करते हैं जब लगभग 24 वर्ष की आयु में उन्होंने मृत्यु को बहुत निकट से देखा। उस अनुभव के बाद यह प्रश्न उनके भीतर गहराई से बना रहा कि मृत्यु के बाद क्या होता है और मनुष्य को अपने जीवन में वास्तव में क्या करना चाहिए। ब्रह्मजाल सुत्त और अग्गञ्ञ सुत्त जैसे बुद्ध के उपदेशों के अध्ययन से आभासार लोक और प्राणियों के क्रमशः स्थूल अवस्थाओं में आने की प्रक्रिया को समझाया जाता है। लेकिन आभासार भी अंतिम लक्ष्य नहीं है। अंतिम उद्देश्य पुनर्जन्म की पूरी प्रक्रिया को समाप्त करके निर्वाण प्राप्त करना है। इस मार्ग की शुरुआत शील से होती है। केवल पांच शीलों को दोहराना पर्याप्त नहीं है। शिक्षापद का अर्थ स्वयं को प्रशिक्षित करना है। साधक को अपने शरीर, वाणी और मन में चल रहे अकुशल कर्मों को पहचानना और उन्हें छोड़ना सीखना चाहिए। दस अकुशल कर्मों में प्राणातिपात, अदिन्नादान, कामेसु मिच्छाचार, मुसावाद, पिसुणा वाचा, फरुसा वाचा, सम्फप्पलाप, अभिज्झा, व्यापाद और मिच्छादिट्ठि सम्मिलित हैं। इनके पीछे मुख्य रूप से राग, द्वेष और मोह कार्य करते हैं। शील का वास्तविक अभ्यास तब शुरू होता है जब साधक केवल बड़ी गलतियों को ही नहीं बल्कि छोटी से छोटी त्रुटि को भी पहचानना शुरू करता है। बुद्ध की शिक्षा है कि साधक छोटी सी गलती में भी खतरा देखे। उदाहरण के लिए किसी ऐसी वस्तु को लेना जो दी नहीं गई, बिना अधिकार किसी सेवा या सॉफ्टवेयर का उपयोग करना, सुविधा के लिए झूठ बोलना, कठोर वाणी बोलना या मनोरंजन और भोजन के माध्यम से लगातार राग को पोषण देना भी अभ्यास का विषय है। आगामी रिट्रीट का उद्देश्य केवल आंखें बंद करके लंबे समय तक बैठना नहीं है। पहले यह देखना आवश्यक है कि हमारे दैनिक जीवन में कौन से अकुशल व्यवहार और मानसिक प्रवृत्तियां अभी भी मौजूद हैं और उन्हें कैसे छोड़ा जाए। साधना का क्रम इस प्रकार समझाया गया है। 1 शील 2 इंद्रिय संवर 3 भोजन में मात्रा जानना 4 जागरियानुयोग 5 सति संपजञ्ञ 6 समथ 7 प्रथम से चतुर्थ झान 8 विपस्सना 9 विराग और निरोध 10 विमुक्ति और निर्वाण सति संपजञ्ञ का अर्थ केवल ध्यान में बैठकर श्वास देखना नहीं है। चलते समय, खाते समय, काम करते समय, बोलते समय और दैनिक जीवन के प्रत्येक कार्य में यह जानना आवश्यक है कि शरीर और मन में क्या हो रहा है। कर्म के सिद्धांत के अनुसार हम अपने कर्मों के स्वामी और उत्तराधिकारी हैं। हमारे कर्म ही हमारे भविष्य की परिस्थितियों को प्रभावित करते हैं। इसलिए जीवन में मिलने वाले सुख दुख और कठिन संबंधों को केवल दूसरों को दोष देकर नहीं देखा जाना चाहिए। साधक को यह देखना चाहिए कि वर्तमान परिस्थिति में वह नया राग, द्वेष या अकुशल कर्म पैदा तो नहीं कर रहा है। इस पूरी वार्ता का मुख्य संदेश यह है कि शील ध्यान से अलग कोई प्रारंभिक औपचारिकता नहीं है। शील ही मन को राग, द्वेष और मोह से मुक्त करने की पहली वास्तविक प्रक्रिया है। शील से इंद्रिय संवर विकसित होता है। इंद्रिय संवर से भोजन और जीवन में संयम आता है। इससे जागरूकता और सति संपजञ्ञ विकसित होती है। यही तैयार मन समथ और झान के योग्य बनता है। फिर विपस्सना के माध्यम से अनिच्च, दुक्ख, अनत्ता, उत्पत्ति और निरोध को समझकर तृष्णा और उपादान को समाप्त करने की दिशा खुलती है। अंतिम लक्ष्य केवल बेहतर जीवन या उच्च लोक में पुनर्जन्म नहीं है। लक्ष्य यह है कि पुनः किसी गर्भ में प्रवेश करने की आवश्यकता ही समाप्त हो जाए। यही बुद्ध धम्म की दिशा है। अकुशल को पहचानना अकुशल को छोड़ना कुशल को विकसित करना मन को परिष्कृत करना वास्तविकता को यथाभूत जानना तृष्णा और उपादान का निरोध करना और जन्म मरण के चक्र को समाप्त करना