जिसे हम सच मानकर पकड़े हैं… क्या वही बंधन बन रहा है? | अलगद्दूपम सुत्त | MN 22 मुक्ती तक का.....
ARYA MAITRI PRESENCE
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जिसे हम सच मानकर पकड़े हैं… क्या वही बंधन बन रहा है? | अलगद्दूपम सुत्त | MN 22 मुक्ती तक का.....
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जिस बात को मन ने “सही” मान लिया…
क्या उसकी पकड़ दिखाई दे रही है?
कोई विचार आया…
क्या उसे सच मान लिया गया?
कोई बात सुनी…
मन में स्वीकार या विरोध जैसा कुछ हुआ क्या?
पसंद हुई?
नापसंद हुई?
अपनी बात सही साबित करने की कोई गति उठी क्या?
या कुछ भी स्पष्ट नहीं है?
अलगद्दूपम सुत्त — MN 22 में बुद्ध धम्म को गलत ढंग से पकड़ने के खतरे को साँप के उदाहरण से और धम्म के सही उपयोग को बेड़े के उदाहरण से समझाते हैं।
बेड़ा नदी पार करने के लिए उपयोगी है…
लेकिन पार पहुँचने के बाद भी उसे सिर पर उठाकर चलना आवश्यक है क्या?
इस सहज अनुभव-अभ्यास में कोई निष्कर्ष पहले से मानना आवश्यक नहीं।
अभी जो सुनाई दे रहा है…
अभी जो दिखाई दे रहा है…
उसके संपर्क में मन में कुछ हो रहा है क्या?
पकड़ हो रही है क्या?
विरोध हो रहा है क्या?
“मेरा विचार”, “मेरी बात”, “मैं सही” जैसा कुछ दिखाई दे रहा है क्या?
या अनुभव कुछ और है?
कुछ किया जा रहा है क्या?
फिर भी… कुछ अपने-आप हो रहा है क्या?
कुछ न करना… बहुत कुछ?
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🙏 भवतु सब्ब मंगलं
सबका मंगल हो।
इस अभ्यास के दौरान आपके भीतर वास्तव में क्या दिखाई दिया?
कोई निष्कर्ष देने की आवश्यकता नहीं।
जो प्रत्यक्ष अनुभव हुआ, उसे अपने शब्दों में Comment में साझा कर सकते हैं।
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