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श्री गीता ज्ञान यज्ञ भाग 42**11वां अध्याय विश्वरूप दर्शन**(शरणागति) भाग ६*‪@bhaktimeshakti2281‬

Bhakti me Shakti

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श्री गीता ज्ञान यज्ञ भाग 42**11वां अध्याय विश्वरूप दर्शन**(शरणागति) भाग ६*‪@bhaktimeshakti2281‬

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Ram bhakti ‪@bhaktimeshakti2281‬ परम पूज्य डाक्टर श्री विश्वामित्र जी महाराज जी के मुखारविंद से ((2082)) श्री गीता ज्ञान यज्ञ भाग 42 11वां अध्याय विश्वरूप दर्शन (शरणागति) भाग ६ भगवान श्री कहते हैं -भक्त कुछ एक प्रकार की प्रारब्ध होती है, जो अवतारों को भी भुगतनी पड़ती है । वह भी इससे मुक्त नहीं। ऐसी ही प्रारब्ध तेरी थी । तुझे इसका भुगतान भुगतना ही था । मैंने प्रारब्ध नहीं बदली, लेकिन इस भोग की जो पीड़ा थी, वह मैंने सहन कर ली । वह मैंने अपने ऊपर ले ली है । संसार में ऐसा कोई ऐसा माई का लाल, जो ऐसा करने वाला हो, परमात्मा के सिवाय, परमात्मा के अतिरिक्त, अपने समर्पित के लिए, अपने शरणागत के लिए इससे बढ़कर भगवान और क्या करें । प्रारब्ध भोग तो भोगना ही था तुम्हें, लेकिन मैंने तुम्हें पीड़ा नहीं होने दी । मैंने पीड़ा, जो कुछ उसकी वेदना, जो कुछ भी उसका प्रभाव होना था, वह मैंने अपने ऊपर ले लिया है । मुझे लगता है परमात्मा ने चाबुक के निशान भी उसकी पीठ पर नहीं पड़ने दिए । वह निशान भी अपनी पीठ पर ले लिए। वह जो खून निकल रहा था, वह भी अपनी पीठ से निकाला । उसको आंच नहीं आने दी । यह भगवान की करनी, यह भगवान की महिमा । यह शरणागति, यह समर्पण । कोरे कागज पर लिखवा लो कभी किसी को शांति, संतुष्टि, परम शांति, परमानंद की प्राप्ति नहीं हो सकेगी । आज एक बहुत बड़े जाने पहचाने महात्मा की, महर्षि की बात करते हैं । महर्षि व्यास देव । भक्तजनो यह तो थी संकलन की बात। ब्रह्मसूत्र लिखें, पुराणों की रचना की, अध्यात्म रामायण की रचना की । इतना काम जिंदगी में, युगो युगांतरो तक, किसी अन्य महर्षि ने, किसी अन्य महात्मा ने नहीं किया । पूज्य हैं । संसार भर में महर्षि व्यास देव की पूजा होती है । आज यह सब कुछ करने के बाद सरस्वती नदी के किनारे अकेले बैठे हैं । आंखों में आंसू, उदासी के आंसू । बाहरी संतोष होना चाहिए, यह कर दिया, वह कर दिया, वह कर दिया, ऐसा काम कर दिया, जो संसार में अन्य कोई कर नहीं सकता । यह सब बातें बहुत संतोष, बहुत हर्ष देने वाली बातें । लेकिन महर्षि व्यास देव जी उदास है । आंखों में आंसू, अकेले बैठे हुए । देवर्षि नारद वहां पधारे हैं। आकर प्रणाम किया । प्रणाम महर्षि, प्रणाम देवर्षि । महर्षि आपकी आंखों में उदासी के आंसू ? हां देवर्षि । क्या बात है किस अपराध के कारण ? क्या कहूं, मुझे स्वयं को पता नहीं है । देवर्षि कहते हैं महर्षि जहां तक मुझे पता है दो कारण है जिनके कारण आदमी दुखी, उदास, चिंतित, भयभीत रहता है । एक तो यह जब व्यक्ति की जिंदगी में कोई अभाव रहता है, व्यक्ति की कोई ऐसी इच्छा है, जो पूरी नहीं कर रहा परमात्मा । वह अभाव दुखी रखेगा, उदास, चिंतित रखेगा भयभीत रखेगा, बेचैन रखेगा । दूसरा कारण -एक कारण । दूसरा कारण, यदि किसी का स्वभाव, किसी का आचरण, किसी का व्यवहार कटु है, कठोर है, बड़ी बारीक बातें कहीं देवर्षि नारद ने, व्यंगात्मक है, उग्र है, उसे भी शांति नहीं मिलेगी । महर्षि ने दोनों बातें सुन ली है । कहा देवर्षि बहुत कुछ किया है मैंने । मुझे लगता है जो करना चाहिए था, वह नहीं हुआ। मैं अभी तक परमात्मा का नहीं हुआ, मैं परमात्मा के समर्पित नहीं हुआ, मैं परमात्मा के शरणागत नहीं हुआ अभी तक। मेरी जिंदगी में इसी आभाव के कारण मैं आज बहुत उदास हूं । देवर्षि तत्काल समर्थन करते हैं, हां महर्षि यह ज्ञान का अभिमान, ज्ञानी होने का अभिमान, विद्वत्ता का अभिमान, देवर्षि नारद यहां कहते हैं; कभी साधक जनो रामकृष्ण परमहंस ने मां से कहा -मां बड़े-बड़े विद्वान मेरे पास आते हैं। मैं बुद्धू, मैं अनपढ़ मैं उन्हें क्या जवाब दूं । वह इतने विद्वान प्रकांड विद्वान मैं उन्हें क्या जवाब दूं, मुझे विद्या दे । मां ने कहा -पुत्र क्या मांग रहा है । जानते हो इन विद्वानों, प्रकांड विद्वानों, बड़े-बड़े महापुरुष अपने आपको कहलवाने वाले, इनकी दुर्गति क्या होती है, मैं तुम्हें बताऊं ? गंदी नाली के कीड़े मकोड़े बनते हैं, और मैं नहीं चाहती कि तू वैसा बने । तू जैसा है अनपढ़, गवार, पर सरल है, ठीक है । ऐसी विद्वत्ता क्या करनी, जो अभिमानी बनाए । ऐसी विद्या क्या करनी, जो अभिमानी बनाएं। विद्या वह जो विनयवान व्यक्ति को बनाए । जो चरणों की, हर एक के चरणों की, धूलि बना दे, वह परा विद्या, वह विद्या। रामकृष्ण तू ऐसा है । मैं तुम्हें वह विद्या नहीं दूंगी । क्यों ? मैं नहीं चाहती तेरी भी वही दुर्गति हो, जो so called विद्वानों की हुई है, so called ज्ञानियों की, महाज्ञानियों की हुई है । महर्षि के जीवन के अंदर यह अभाव खटक रहा है । मैं अभी तक निमित्त नहीं बना । कल करेंगे साधक जनों इसके आगे की चर्चा। आज यही समाप्त करने की इजाज़त दीजिएगा । धन्यवाद ।