जब इन्द्र ने माँगा कर्ण का कवच और कुंडल 🛡️ | Rashmirathi Canto 4
SHEKHAR SUMAN
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जब इन्द्र ने माँगा कर्ण का कवच और कुंडल 🛡️ | Rashmirathi Canto 4
29 просмотров · 3 недели назад
SHEKHAR SUMAN
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"धन्य हमारा सुयश आपको खींच मही पर लाया,
स्वर्ग भीख माँगने आज, सच ही, मिट्टी पर आया।" ⚡
Welcome to the most spine-chilling moment in Ramdhari Singh 'Dinkar's Rashmirathi (Canto 4).
In this legendary exchange, the disguised beggar (Lord Indra) tries to back out, claiming he fears asking for a charity so great that it might break Karna's unbreakable vow. Stung by this doubt, Karna takes a terrifying oath, offering everything—his kingdom, his head, or even his lifelong servitude.
Cornered by Karna's absolute resolve, the beggar finally asks for the impossible: his divine Kavach (armor) and Kundal (earrings). The lightning of realization strikes Karna, but instead of fear, he responds with immense pride. He looks at the beggar and smiles, realizing that his fame as a giver has forced the King of Gods himself to come down to the mud of the Earth to beg!
📜 Verses recited in this video:
मही डोलती और डोलता नभ मे देव-निलय भी,
कभी-कभी डोलता समर में किंचित वीर-हृदय भी।
डोले मूल अचल पर्वत का, या डोले ध्रुवतारा,
सब डोलें पर नही डोल सकता है वचन हमारा।”
भली-भाँति कस कर दाता को, बोला नीच भिखारी:
“धन्य-धन्य, राधेय! दान के अति अमोघ व्रत धारी।
ऐसा है औदार्य, तभी तो कहता हर याचक है,
महाराज का वचन सदा, सर्वत्र क्रियावाचक है।
मैं सब कुछ पा गया प्राप्त कर वचन आपके मुख से,
अब तो मैं कुछ लिए बिना भी जा सकता हूँ सुख से।
क्योंकि माँगना है जो कुछ उसको कहते डरता हूँ,
और साथ ही, एक द्विधा का भी अनुभव करता हूँ।
कहीं आप दे सके नहीं, जो कुछ मैं धन माँगूंगा,
मैं तो भला किसी विधि अपनी अभिलाषा त्यागूँगा।
किंतु आपकी कीर्ति-चाँदनी फीकी हो जाएगी,
निष्कलंक विधु कहाँ दूसरा फिर वसुधा पाएगी?
है सुकर्म, क्या संकट मे डालना मनस्वी नर को?
प्रण से डिगा आपको दूँगा क्या उत्तर जग भर को?
सब कोसेंगें मुझे कि मैने पुण्य मही का लूटा,
मेरे ही कारण अभंग प्रण महाराज का टूटा।
अतः विदा दें मुझे, खुशी से मैं वापस जाता हूँ।”
बोल उठा राधेय: “आपको मैं अद्भुत पाता हूँ।
सुर हैं, या कि यक्ष हैं अथवा हरि के मायाचर हैं,
समझ नहीं पाता कि आप नर हैं या योनि इतर हैं।
भला कौन-सी वस्तु आप मुझ नश्वर से माँगेंगे,
जिसे नहीं पाकर, निराश हो, अभिलाषा त्यागेंगे?
गो, धरती, धन, धाम वस्तु जितनी चाहे दिलवा दूँ,
इच्छा हो तो शीश काट कर पद पर यहीं चढा दूँ।
या यदि साथ लिया चाहें जीवित, सदेह मुझको ही,
तो भी वचन तोड़कर हूँगा नहीं विप्र का द्रोही।
चलिए, साथ चलूँगा मैं साकल्य आप का ढोते,
सारी आयु बिता दूँगा चरणों को धोते-धोते।
वचन माँग कर नहीं माँगना दान बड़ा अद्भुत है,
कौन वस्तु है, जिसे न दे सकता राधा का सुत है?
विप्रदेव! माँगिए छोड़ संकोच वस्तु मनचाही,
मरूँ अयश कि मृत्यु, करूँ यदि एक बार भी ‘नाहीं’।”
सहम गया सुन शपथ कर्ण की, हृदय विप्र का डोला,
नयन झुकाए हुए भिक्षु साहस समेट कर बोला:
“धन की लेकर भीख नहीं मैं घर भरने आया हूँ,
और नहीं नृप को अपना सेवक करने आया हूँ।
यह कुछ मुझको नहीं चाहिए, देव धर्म को बल दें,
देना हो तो मुझे कृपा कर कवच और कुंडल दें।”
‘कवच और कुंडल!’ विद्युत छू गयी कर्ण के तन को,
पर, कुछ सोच रहस्य, कहा उसने गंभीर कर मन को;
“समझा, तो यह और न कोई, आप, स्वयं सुरपति हैं,
देने को आये प्रसन्न हो तप में नयी प्रगती हैं।
धन्य हमारा सुयश आपको खींच मही पर लाया,
स्वर्ग भीख माँगने आज, सच ही, मिट्टी पर आया।
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