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भला हुआ मोह की दीवार ढही | मोह ने बाँटा, प्रेम ने जोड़ा | कबीर प्रेरित भजन | Lyrical Video

Divine Bhakti Vibes

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भला हुआ मोह की दीवार ढही | मोह ने बाँटा, प्रेम ने जोड़ा | कबीर प्रेरित भजन | Lyrical Video

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भला हुआ मोह की दीवार ढही | मोह ने बाँटा, प्रेम ने जोड़ा | कबीर प्रेरित भजन | Lyrical Video मोह की दीवार इंसान को अपने और पराए में बाँट देती है। धन, परिवार, रुतबा और अधिकार के पीछे भागते-भागते मन इतना घिर जाता है कि सामने खड़े इंसान का दुख भी दिखाई नहीं देता। लेकिन जब मोह की दीवार ढहती है, तो भेद मिटने लगता है। जहाँ अपना-पराया नहीं रहता, वहीं प्रेम जन्म लेता है। और जहाँ प्रेम जागता है, वहीं हरि और राम की झलक मिलने लगती है। यह कबीर की निर्गुण भक्ति और उनके जीवन-दर्शन से प्रेरित एक भावपूर्ण भजन है। अगर इस गीत की कोई पंक्ति आपके मन को छू जाए, तो कमेंट में जरूर लिखें — ❤️ 🎵 भजन: भला हुआ मोह की दीवार ढही 🙏 कबीर प्रेरित निर्गुण भजन 🎧 Lyrical Video ━━━━━━━━━━━━━━━━━━ 🪔 LYRICS ━━━━━━━━━━━━━━━━━━ भला हुआ मोह की दीवार ढही, ढह गए ईंट और पत्थर। जिसको समझा घर था मैंने, निकला वो कैद का मंज़र। अपना-पराया करते-करते, मन में पड़े थे छाले। अपनों को तो गले लगाया, दूजों के लिए लगा दिए ताले। तेरा-मेरा, अपना-पराया करके, रोज़ नई एक ईंट लगाई। स्वार्थ के गारे से चुन-चुनकर, कैसी ये दीवार बनाई। दीवारों पर रंगत पोती, मन की सीलन न देखी। बाहर-बाहर महल बनाया, भीतर की दरार न देखी। सात पीढ़ियों के लिए बंदे, धन की नींव जमाई। द्वार खड़ा जो भूखा आया, उसको रोटी न खिलाई। एक परत थी धन के मोह की, एक परत परिवार की। एक परत झूठे रुतबे की, एक परत अधिकार की। एक-एक करके परतें उखड़ीं, गिरा मोह का पलस्तर। दीवार ढही तो बंदे देखा, भीतर खुला था अंबर। मोह ने बाँटा तेरा-मेरा, प्रेम ने मिटाई दीवार। एक ही ज्योति सभी में जागे, कैसा भेद-विचार? अरे मनवा… ज़रा सोच… सात पीढ़ियों के लिए तिजोरी भरता रहा, पर द्वार पर खड़े भूखे को एक रोटी न दे सका। अपने और पराए की दीवार चुनते-चुनते, तू भीतर ही कैद हो गया। धन-दौलत यहीं रह जाएगी, तन भी एक दिन छूट जाएगा। जिनके लिए जोड़ा जीवन भर, उनका साथ भी छूट जाएगा। अच्छा हुआ… आज ये दीवार ढह गई। याद रख— मोह तुझे अपना बनाकर बाँधता है, और प्रेम… तुझे सबका बना देता है। कबीरा कहे सुन प्यारे… एकै माटी सबन की, एकै सबन को रूप। कोई भीख माँगत फिरे, कोई कहावत भूप॥ कोई कहावत भूप… दीवार के उस पार जो थे, उनका दुख अब दिख पाया। मोह के अंधे चश्मे ने, कैसी दूरी थी बनाई। दया-धर्म सब पीछे छूटा, जब तक मैं और मेरा था। ज्ञान का सूरज जब चमका, छँट गया घोर अँधेरा। प्रेम ने आकर भेद मिटाया, गिरा दिए सब ऊँचे द्वार। दूजे की पीर भी अपनी लागे, यही प्रेम का सार। भूखे की रोटी में हरि दिखे, दुखिया में भगवान। जिस दिन सब अपने लगने लगे, मिट गया अभिमान। न कोई ऊँचा, न कोई नीचा, न कोई अपना गैर। एक ही साँस सभी में धड़के, गूंजे एक ओंकार। मोह की दीवारें ढहती जाएँ, खुलता जाए गगन। दया-धरम हो मन की भाषा, प्रेम बने सच्चा जीवन। भला हुआ मोह की दीवार ढही, ढह गया माया का जाल। तेरा-मेरा करते-करते, झूठा था हिसाब। न ये दीवारें मुक्ति हैं, न ये ईंटें शान। मन का आँगन खुल जाए तो, यहीं बसें भगवान। प्रेम का अमृत पी ले बंदे, कट जाए मन का रोग। भला हुआ मोह की दीवार ढही… भला हुआ मोह की दीवार ढही… जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं। दीवार ढही, मिटा भेद, भीतर जागा राम। न कोई मेरा… न कोई पराया… धीरे-धीरे… राम का नाम… ━━━━━━━━━━━━━━━━━━ अगर यह भजन आपको भीतर तक छू जाए, तो इसे अपने परिवार और मित्रों के साथ जरूर साझा करें। 🙏 #KabirBhajan #KabirVani #KabirKeDohe #KabirInspired #NirgunBhajan #NirgunBhakti #KabirDas #SantKabir #BhaktiGeet #HindiBhajan #RamBhajan #PremBhakti #SpiritualBhajan #LyricalVideo