सागर में बनी दो नाव , एक नाव को बृहमा बाबा चला रहे हैं एक को श्री कृष्ण चला रहे है
सुर्य वन्शी नारायणी पाठ शाला
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सागर में बनी दो नाव , एक नाव को बृहमा बाबा चला रहे हैं एक को श्री कृष्ण चला रहे है
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सुर्य वन्शी नारायणी पाठ शाला
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इस चित्र में पूरी ईश्वरीय पढ़ाई की दो अवस्थाएँ दिखाई है और एक सागर से दूसरे सागर तक की यात्रा बहुत गहराई से देखी जा रही है। चित्र को केवल धार्मिक दृश्य नही समझना , बल्कि यह पूरी पढ़ाई की यात्रा का नक्शा है।
🌊 दो नावें, एक मन का सागर और एक अन्तिम ट्रेन चित्रों द्वारा ईश्वरी पढ़ाई की अलौकिक यात्रा करवाई गई है
मुरली का महावाक्य है—
“अन्त में एक ही ट्रेन जायेगी।”एक ही नाव जायेगी,जाना कहां है सात समुंदर पार जाना है सात समुंदर कौन से है इंद्रियों कर्म इंद्रियों के भान से बाहर निकलना है
इस एक वाक्य में पूरी यात्रा का रहस्य छिपा है।
यात्राएँ अनेक दिखाई दे सकती हैं, साधन अनेक हो सकते हैं, चित्र अनेक हो सकते हैं, पर गन्तव्य की अन्तिम दिशा एक ही है।
साप्ताहिक कोर्स के इस एक पाठ में विशाल, तूफानी सागर के बीच दो नावें दिखाई देती हैं।
एक नाव ब्रह्मा बाबा चला रहे हैं और दूसरी नाव कृष्ण चला रहे हैं।
त्रिमूर्ति शिव भगवान चित्र कार ने केवल दो नावें नहीं बनाईं—
✅मानो उसने ईश्वरीय पढ़ाई के दो पड़ाव चित्रित कर दिये।
🚣 पहली नाव — **अशान्त महासागर से पार
कृष्ण की नाव में बैठे खुद ब्राह्मण बच्चे अभी मझधार में दिखाई देते है।
यह मझधार कोई भौगोलिक स्थान नहीं—
यह उस चेतना का प्रतीक है जो अभी पुरानी दुनिया की तूफानी वृत्तियों से निकल रही है।
चारों ओर लहरें हैं—
०भावनाओं का तूफान,
०विकारों का वेग,
०अहंकार की उठती तरंगें,
०मोह की खींचतान,
०क्रोध और अशान्ति की उथल-पुथल।
०नाव डूबती नहीं—मुरली के मधुर वाक्य है नाव हिलेगी डुलेगी परन्तु डुबेगी नहीं,
क्योंकि* ईश्वरीय ज्ञान इस नाव को दिशा दे रहा है।
ब्रह्मा ज्ञान की नाव का कार्य है—
अशान्त महासागर से आत्मा को निकालकर
शान्त महासागर तक पहुँचाना।
यहाँ त्याग संसार का नहीं,
०उग्र वृत्तियों का है।
०यहाँ देह छोड़नी नहीं,
०देह-का अभिमान छोड़ना है।
०यहाँ सम्बन्ध तोड़ने नहीं,
०सम्बन्धों में छिपे मोह को हल्का करना है।
यहाँ जीवन से भागना नहीं,
जीवन जीने की वृत्ति बदलनी है।
🌊 एक सागर से दूसरे सागर तक
चित्र का सबसे गहरा संकेत शायद यही है—
एक ओर अशान्त महासागर, दूसरी ओर शान्त महासागर।
मानो दोनों ओर जल है, पर जल का रंग बदल गया है।
एक ओर धुँधला, खारा, सफेद-सा जल—
अशान्त मन का प्रतीक।
दूसरी ओर गहरा नीला, आकाश जैसा शांत जल—
स्थिर, गम्भीर और विशाल चेतना का प्रतीक।
०सागर वही है,
०पर अवस्था बदल गई।
इसीलिए स्वर्ग किसी दूसरे ग्रह पर जाने का नाम मात्र नहीं—
मन के सागर का खारा पानी मीठा हो जाना भी स्वर्ग की शुरुआत है।
०जब मन चंगा हुआ,कठोती में गंगा
०मन के सारे कलुष धुल गये,
विचारों का तूफान थम गया—
तभी शान्त महासागर दिखाई देता है।कठौती में गंगा समा गई!!
🦢 स्वाति की बूंद और पपीहा
पपीहा (मन)स्वाति की एक बूंद के लिए सारी रात पुकारता है।
उसकी पुकार में एकाग्रता है—
उसे हजारों जलधाराएँ नहीं चाहिएं।
स्वाती की एक बूंद चाहिए।उस शुक्ल पक्ष की रात की एक बूंद
वैसी ही है आत्मा की याद।
संसार की हजारों प्राप्तियों के बीच
आत्मा की पुकार हो—
०“मुझे वही सत्य चाहिए।
०मुझे वही एक चाहिए।”
०जब चाहत एक हो जाती है,
०चेतना बिखरना बन्द कर देती है।
०और जब चेतना बिखरना बन्द करती है!!—