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जब मन-बुद्धि आत्मा के आगे समर्पित होती है

सुर्य वन्शी नारायणी पाठ शाला

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जब मन-बुद्धि आत्मा के आगे समर्पित होती है

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सुर्य वन्शी नारायणी पाठ शाला
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याद किसको करना है? यही आध्यात्मिक यात्रा का सबसे गहरा प्रश्न है। जब मन अपनी अलग सत्ता छोड़कर आत्मा की सुनता है और बुद्धि भी आत्मा के अनुसार चलती है, तब भीतर का त्रिवेणी संगम आरम्भ होता है। यही संगम बाहर कहीं नहीं, अपने ही घट के भीतर है। इस अध्याय में समझेंगे— 🕉️ अखंड योग क्या है? 🌺 मन, बुद्धि और आत्मा का वास्तविक संगम क्या है? 🔥 “नग्न होकर ज्ञान-स्नान” का आध्यात्मिक संकेत क्या है? 🐘 गजराज और विशाल मस्तक किस ओर इशारा करते हैं? 🐘 गणेश का विशाल मस्तक विशाल बुद्धि का प्रतीक क्यों है? 🔱 शंकर अवस्था और अहंकार से न्यारे होने का क्या संबंध है? 🌊 “कुंभ” बाहर है या हमारे अपने घट में? 🌸 प्रयागराज के प्रतीक को भीतर की यात्रा से कैसे समझें? देह को साधन समझो, कर्तापन छोड़ो, साक्षी बनो और एक को याद करो—अन्ततः वही सत्य चेतना में रह जाए। यही अखंड योग है। यही बेहद की ओर यात्रा है। यही अपने मास्टर अविनाशी स्वरूप की पहचान है।