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मानस-प्रबोध | मनाचे श्लोक क्रमांक - ३ | निरुपणकार - श्री. विनीत जोशी

Shree Chaitanya Ram

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मानस-प्रबोध | मनाचे श्लोक क्रमांक - ३ | निरुपणकार - श्री. विनीत जोशी

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Shree Chaitanya Ram
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प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा। पुढे वैखरी राम आधी वदावा॥ सदाचार हा थोर सांडूं नये तो। जनीं तोचि तो मानवी धन्य होतो॥३॥